एक इलाहाबादी लड़के ने

एक इलाहाबादी लड़के ने दूसरे लड़के को उलाहना दी- तुम गाली बहुत देते हो।
दूसरा तपाक से बोला- कौन …. बोला कि मैं गाली देता हूं।

इस सरकार का भी कुछ ऐसा ही मामला है। राहुल बजाज बोले कि डर का माहौल है तो कई मंत्री नेताओं ने नसीहत दे डाली। ट्विटर पर ट्रोल हुए। सीतारमण ने तो कह दिया कि ऐसी बातों से राष्ट्र हित प्रभावित होता है। मतलब प्रकारांतर से है यह देशद्रोह ही।

यही हुआ था लेखकों और कलाकारों के साथ। तीन तीन बड़े बुद्धिजीवी मार दिए गए थे। अखलाक की शक के आधार पर लिंन्चिंग की गई और नेता मॉब के समर्थन में आ गए। जब लेखकों ने पुरस्कार लौटाया तो संगठित ढंग से सरकारी पलटवार हुआ।

सरकार का ऐसा जवाब दिया जाना और उस इलाहाबादी लौंडे के जवाब में क्या अंतर है? यही कि एक मंत्री साधारण आदमी नहीं होता। यह गम्भीर बात है।

यह ऐसी सरकार है जिसकी आलोचना करने के बाद यह संगठित ढंग से पलटवार करती है। अहंकार का स्तर सातवें आसमान पर है।

छह तिमाही की गिरावट के बाद जीडीपी 4.5 प्रतिशत के झूठे आंकड़े पर पहुंच गई है। जानकर बताते हैं कि असली आंकड़ा डेढ़ प्रतिशत से ज्यादा नहीं है। लेकिन क्या मजाल कि कोई आलोचना कर दे।

दिलचस्प तो ये है कि नारा लग रहा है राष्ट्र निर्माण का। अगर पूरी अर्थव्यवस्था ठप कर देने को, प्रतिष्ठित संस्थानों को पंगु कर देने को राष्ट्र निर्माण कहते हैं तो ध्वंस किसे कहते हैं?

कम से कम राष्ट्र निर्माण उनसे मत सीखिए जिन्होंने देश की अर्थव्यवस्था गर्त में पहुंचा दी और असली राष्ट्र नायकों को गाली देते हैं।
krishnkant

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