सलीम-जावेद ने दोबारा लिखी थी स्क्रिप्ट

त्रिशूल, सलीम-जावेद ने दोबारा लिखी थी स्क्रिप्ट
– वीर विनोद छाबड़ा
आजकल ज़ी क्लासिक चैनल पर रोज़ाना एक-आध चालीस-पैंतालीस साल पुरानी फ़िल्म देख लेता हूँ। कुछ अच्छी लगती हैं तो कुछ संस्मरण कुरेदती हैं। उस दिन गुलशन राय की ‘त्रिशूल’ (1978) देखी तो याद आया कि सलीम जावेद ने अमिताभ के पिता राजकुमार गुप्ता का किरदार दिलीप कुमार को ध्यान में रख कर लिखा था। मगर जाने क्यों, बात बनी नहीं। दिलीप कुमार के साथ ये ट्रेजेडी अक्सर रही है, बात बनते-बनते बिगड़ जाती है और श्रेय कोई दूसरा ले जाता है। इसमें भी दिलीप कुमार की जगह संजीव कुमार आ गए जो उन दिनों दिलीप की हर छोड़ी फिल्म लपक लेते थे और फिर उन किरदारों में ऐसी जान फूंकते थे कि दिलीप कुमार भी खुद से ज़रूर कहते होंगे, यार, मैंने वाकई ग़लती कर दी।
उन दिनों राइटर सलीम-जावेद की पतंग सातवें आसमान पर उड़ रही थी। जो कह दिया और जो लिख दिया, वही फाईनल है। प्रोड्यूसर बिचौलियों के पैर छूते थे, जितना चाहे दाम ले लो मगर सलीम-जावेद को साइन करा दो। लेकिन ‘त्रिशूल’ के रशेज़ देख गुलशन राय भिन्ना गए। ये क्या है? बिलकुल बकवास है। तीन दिन भी थिएटर में फिल्म न ठहरे। उन्होंने सलीम-जावेद से पूछा, इस फिल्म को पिटने से बचाने का क्या तरीका है? उन्होंने कहा, नष्ट कर दें। गुलशन राय का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। आखिकार वो बड़े प्रोड्यूसर थे। वाहियात जवाब पसंद नहीं करते थे। ‘जॉनी मेरा नाम’ उन्होंने ही बनाई थी। उन्होंने डायरेक्टर यश चोपड़ा से शिक़ायत की – ये कल के लड़के क्या समझते हैं खुद को?
यश ने आश्वस्त किया – मैं ठीक करता हूँ उनको। फिर यश ने सलीम जावेद को बुलाया – देखो बरखुरदार, तुम होगे क़लम के धनी। मगर ये मत भूलो कि तुम्हारी पिछली दो फ़िल्में ईमान-धरम’ और ‘चाचा-भतीजा’ बॉक्स ऑफिस पर नरम गयी हैं। एक फिल्म और फ्लॉप होने का मतलब तो तुम दोनों जानते ही हो। सलीम-जावेद मानो ज़मीन पर उतर आये हों। ये पहली बार था कि उन्हें किसी स्क्रिप्ट पर दोबारा बैठना पड़ा। शांति (वहीदा रहमान) के किरदार को बोल्ड बना दिया जो बजाये हाथ-पैर जोड़ने के बिन-ब्याही मां बनना स्वीकार करती है और जिस बेटे को जनती है वो बड़ा होकर अपने पिता को बर्बाद करने का अहद लेता है और उसे अपना ‘नाजायज़ बाप’ बताता है। स्क्रिप्ट में वो दृश्य भी जोड़ा गया जिसमें हीरो विजय (अमिताभ बच्चन) बलशाली शेट्ठी सहित तमाम गुंडों को ठुकाई के बाद उन्हें अस्पताल पहुंचाने के लिए एक ‘एम्बुलेंस’ में ठूंस देता है। ऐसी ही तमाम दिलचस्प तब्दीलियां की गयीं। काफी बड़ा हिस्सा भी दोबारा शूट हुआ।
दो राय नहीं कि अमिताभ बच्चन ने उसमें बेहतरीन एक्टिंग की थी और वो उस साल के बेस्ट एक्टर के ‘फिल्मफेयर’ अवार्ड के लिए नॉमिनेट भी हुए। हालांकि अवार्ड अमिताभ को ही मिला, मगर ‘डॉन’ के लिए। ‘त्रिशूल’ उदाहरण है कि सलीम-जावेद के अहंकार को गुलशन राय ने ज़मीन पर उतारा और उन्होंने मेहनत करके स्क्रिप्ट दोबारा लिखी और बताया कि एक कमज़ोर स्क्रिप्ट को कैसे हिट फिल्म में बदला जा सकता है। 88 लाख रूपए के लागत लगा कर 2.4 करोड़ कमाने वाली ‘त्रिशूल’ उस साल की तीन टॉप फ़िल्मों में से एक थी।

३० नवंबर २०१९