भीड़तंत्र के राज का समर्थन नहीं

जब आप कह रहे होते हैं कि भीड़ के हवाले कर देना चाहिए था, ज़िंदा जला देना चाहिए, शरीयत के हवाले से पत्थर मार मार कर ख़त्म कर देना था या वहीं मौक़े पर जान से मार देना था तब आप उस भीड़तंत्र को बढ़ावा दे रहे होते हैं जिसका जाने अनजाने आप भी कभी शिकार बन सकते हैं। अगर अपराध सभ्य समाज की निशानी नहीं है तो अपराधी से निबटने का ये तरीक़ा भी क़तई असभ्य और बर्बर है जो मानसिकता के लिहाज़ से आपको उसी अपराधी के समकक्ष बना देता है। अगर अपराध से निपटने के लिए कोई तंत्र है तो उसको मज़बूत करने की कोशिश कीजिए। ये भी समझिए कि घटना की प्रतिक्रिया के समय जानबूझकर दंगाई, असामाजिक, आपराधिक लोग ऐसी बातों को हवा देते हैं। ऐसा करके तंत्र और क़ानून की विश्वसनीयता जानबूझकर ख़त्म की जाती है ताकि उनके अपराध जायज़ साबित हो सकें। आख़िर दंगों के नाम पर या धर्म जाति के नाम पर जब लिंचिंग हो रही होती है तो लोगों की नज़र में वो अपराध नहीं न्याय ही होता है। इसलिए अपनी सड़ी गली आदिमकालीन भावनाओं को या तो क़ाबू में रखें या फिर डस्टबिन में डाल आएं। अगर सभ्य समाज बनाना चाहते हैं तो क़ानून, संविधान और तंत्र का आदर करना, कराना सीखिए और उनमें को कमी है तो सुधार की मांग कीजिए। कोशिश कीजिए अपराधी अपराध से तौबा करें और समाज में नए अपराधी पैदा न हों। एक अपराध का न्याय करने के लिए सौ नए अपराधों को बढ़ावा न दें।

मौलाना पंचवेदी गजरौला वाले 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *