राजीव मित्तल ने बताया अफीम का नशा

अफ़ीम का नशा…

अमिताभ घोष अपने उपन्यास रिवर ऑफ स्मोक या नशे का दरिया में मॉरीशस होते हुए बॉम्बे आते हैं और फिर चीन के तटीय शहर कैंटन ले जाते हैं…….. समय 1835 के आसपास का ….. कैंटन एक तरह से विदेशी कम्पनियों के धंधे का प्रवेशद्वार है…….. कैंटन में दशकों से अफीम ला कर बेची जा रही है…….. ये धंधा इस कदर मुनाफे वाला है कि ब्रिटिश, स्पेन, डच और नया नया आज़ाद हुआ अमेरिका भी इसमें शामिल है.…लेकिन मुनाफे का बड़ा हिस्सा ईस्ट इंडिया कंपनी के पल्ले जा रहा है क्योंकि उसे अफीम का भण्डार भारत से प्राप्त हो रहा है.……भारत में अफीम उगाने के लिए पूरे मालवा और बनारस के आसपास की ज़मीन बेहद मुफीद है.……बॉम्बे का एक पारसी भी इस धंधे में शामिल हो जाता है………..चीन में अफीम का ये कारोबार है तो मुफ्त व्यापार का ही एक हिस्सा …….लेकिन हो चोरी छुपे रहा है.…… इन तस्करों ऊपर उनके देशों की सभी सरकारें मेहरबान हैं…..

कैंटन से अफीम पूरे चीन में प्रवेश कर रही है और देश भर को अफीमची बना रही है…….. 40 साल तक ये धंधा अबाध गति से चलता है…….. एक समय ऐसा आता है जब चीन का सम्राट अपने देशवासियों को अफीम में गर्त होता देख सख्त कदम उठाता है और एक ईमानदार अफसर को कैंटन का चीफ कमिश्नर बना कर भेजता है.…इस आदेश के साथ कि वो कैंटन के भ्रष्ट अफसरों और अफीम के धंधे में शामिल चीनी व्यापारियों का सिर काट डाले .…… और विदेशी जहाज़ों से अफीम जब्त कर उसे जला दे………..

कमिश्नर को घूस देने की काफी कोशिश की जाती है लेकिन वो कड़े कदम उठा कर अरबों रुपए की अफीम जलवा देता है.……तब ईस्ट इंडिया कंपनी ब्रिटेन के सांसदों को पैसा खिला कर और ब्रिटेन की महारानी का वरदहस्त हासिल कर सरकार को ब्रिटिश फौज कैंटन भेजने को प्रेरित करती है.……ब्रिटिश फ़ौज चीन पर अपना कब्जा कर लेती है.…… और अफीम का धंधा फिर से शुरू हो जाता है.……

अब आइये 1991 में, जब भारत में नरसिम्हाराव की सरकार बनी.…तब भारत विदेशी मुद्रा के मामले में कंगाल हो चला था ….. नरसिम्हाराव ने इंटरनेशनल मॉनिटरी फंड के आगे झोली फैलाई…उसकी दो शर्त थीं — पहली मुक्त व्यापार और दूसरी वित्तमंत्री मनमोहन सिंह को ही बनाया जाए……..

और आज हम पूरी तरह रिवर्स स्विंग वाली “ईस्ट” इंडिया कंपनी हैं…

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