नितिन ठाकुर की बात

संसद में गृहमंत्री ने कांग्रेस पर तोहमत थोप दी कि उसने धर्म आधारित विभाजन स्वीकार किया था। ठीक उस क्षण विड़ंबना भी रो दी होगी। जिस विचारधारा से अमित शाह प्रभावित हैं वहां इस बात को आरोप की तरह उछालना या तो जीत के लिए रचा गया राजनीतिक छल है या अपनी ही विचारधारा से द्रोह।

तकनीकी तौर पर ये सही है कि कांग्रेस ने धर्म आधारित विभाजन स्वीकारा था लेकिन तथ्य ये है कि वो ऐसा करनेवाली आखिरी पार्टी थी और उसमें भी ये ध्यान देने लायक है कि गांधी, मौलाना कलाम जैसे बड़े चेहरों ने विभाजन को व्यक्तिगत तौर पर मानने से इनकार तो किया ही था, साथ ही अपने उन साथियों के प्रति आजीवन शिकायत से भरे रहे जिन्होंने ब्रिटिश हुकूमत और मुस्लिम लीग के इस प्रपंच को “डायरेक्ट एक्शन डे” के खूनखराब के बाद सिर्फ इसलिए माना कि अगर देश में शांति बंटवारे से आती हो तो ऐसे ही आ जाए।

गृहमंत्री अपने मुलाकाती कमरे में जिन सावरकर की तस्वीर लगाते हैं उनके विचार विभाजन पर संसद में क्यों नहीं रख रहे थे ये समझना कठिन नहीं है। दरअसल वो जानते हैं कि जिस बात को वो आरोप की तरह पेश करके एनआरसी को न्यायसंगत ठहराना चाहते हैं उस बात के सूत्रधार स्वयं उनके प्रेरणास्रोत सावरकर और उस बात का समर्थक उनका संगठन आरएसएस रहा है। जिन्ना से भी पहले दो राष्ट्र के सिद्धांत का सूत्रपात सावरकर ने किया था। शाह चाहकर भी संघ का कोई बयान नहीं दिखा सकेंगे जहां वो धर्म के आधार पर विभाजन का विरोध करता हो।

हैरत तो इस बात की है कि जो बात पाकिस्तान के बुद्धिजीवी और कूटनीतिज्ञ हुसैन हक्कानी भारत के बारे में समझ रहे हैं वो इस देश के गृहमंत्री ने झुठला दी है। उनकी समझ इस देश के विषय में जो हो पर अभी तक दुनिया कुछ और मानती लगती है। हक्कानी ने अपनी किताब में लिखा था कि भारत और पाकिस्तान का झगड़ा सैद्धांतिक है। जहां एक तरफ पाकिस्तान के निर्माण का आधार धर्म है वहीं भारत के एकीकरण का आधार ये बात मानना है कि धर्म अलग होने के बावजूद लोग इकट्ठे रह सकते हैं। भारत जिस दिन पाकिस्तान निर्माण की जिन्ना थ्योरी (सावरकर थ्योरी भी कह लें) को मान लेगा उस दिन भारत के भीतर ही अनेक पाकिस्तान के बीज पड़ जाएंगे। कमाल ये है कि कांग्रेस ने अंग्रेज़ों के हाथों बंटवारा बर्दाश्त किया था लेकिन आज सत्ता में बैठा गुट खुद ही धर्म के नाम पर ना सिर्फ बंटवारे की राजनीति पर चल रहा है बल्कि संसद में अपने पूर्ववर्ती की “गलती” को आधार बनाकर जिन्ना को भारत में प्रासंगिक बन रहा है।
नितिन ठाकुर

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