बाप दादा के खरीदे सारे बर्तन बेच डालूँगा …

लड़का अपने बाप पर चीख़ रहा । बाप ज़िन्दगी के सत्तर बसन्त बिताकर पलँग पर लेटा लेटा सुन रहा । धूप गुनगुनी है, लड़के की आवाज़ ऊँची होती जा रही कि आपने मेरे लिए किया ही क्या है आजतक । बाप जो पैरालाइसिस का मरीज़ है, पलँग पर अकड़ा पड़ा है, सुन तो रहा मगर कहे तो क्या कहे,लड़के के पांव में अब बाप का जूता छोटा पड़ने लगा है, तो कहने को रह ही क्या जाता ।

लड़के ने घर के 6 कमरे किराए पर उठा दिए हैं । दो मकान बेच चुका है । 16 बीघा जमीन बेच चुका है । मगर चीख़ चीख़ कह रहा कि बाप ने किया ही क्या है । गांव के बुज़ुर्ग बाप की उस मेहनत को जानते हैं, जब गांव में एक झोपड़ी से उसने सफर शुरू किया था । बर्तन के नामपर एक कड़ाही और एक करछुल था । मगर यह बुज़ुर्ग खामोश हैं क्योंकि जानते हैं, फालिज में अकड़ा हुआ बाप तो अब कब्रिस्तान जाएगा, रहना तो लड़के के साथ ही है और कोई क्यों बेढब नशेड़ी गंजेड़ी झूठे नौजवान के मुँह लगे ।

लड़का घर के तांबे,पीतल,स्टील सबके बर्तन बेच चुका है । अब उसे बूढ़े के नीचे बिछी दरी और मसेहरी बेचनी है । वह दरी खींचता हुआ चीख़ रहा कि मेरे बाप ने मेरे साथ किया ही क्या है, सब उसकी हां में हाँ मिला रहें ।

एक बूढ़ा बोला कि रुक जाओ,इतना सब कुछ बेच चुके हो,क्या यह तुम्हारे बाप ने नही बनाया था । ज़मीन क्या हवा में आई थी । बर्तन क्या प्रसाद में मिले थे । कमरे क्या ज़मीन पर लकीर खींचने से बन गए थे । अबे मूर्ख,यह सब जो बेचा जा रहा है, वही तो बनाया गया था । जब बना ही नही होगा,तो बिकेगा क्या । हमे समझ आ गया तुम्हारे बाप महान थे,तुम ही कामचोर निकम्मे हो ।

बूढ़ा पूरी बात बोल पाता कि लड़के ने खींचकर पत्थर उसके सर पर मारा,बूढ़ा वहीं लुढ़क गया,गांव वालों ने कहा ठीक किया,तुम्हारे बाप और इस बूढ़े ने किया ही क्या है और लड़का हंसते हुए पड़ोस की झोपड़ी और दो बीघा ज़मीन का सौदा भी कर आया ।जो साथ खड़े हैं, नासमझ हैं, वह भी बिकेंगे,पूरा गांव बिकेगा,क्योंकि बेचने की लत, ज़मीर बेचकर अमीर होने से शुरू होती है और अनवरत चलती रहती है ।
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