JNU को क्यों नष्ट  करना चाहता है आरएसएस

पिछले एक महीने से JNU फिर से चर्चा का केंद्र बना हुआ है और इसका कारण है विश्वविद्यालय प्रशासन द्वारा अलोकतांत्रिक ढंग से लिया गया अतार्किक और अनावश्यक फीस वृद्धि का फैसला I ये फैसला इतनी हड़बड़ी में लिया गया कि विश्वविद्यालय के वीसी और प्रशासन ने छात्रों की इलेक्टेड बॉडी तक से बात करना जरूरी नहीं समझा I जब ये तानाशाही फैसला छात्रों के बीच एक फ़रमान की तरह आया तो उनमें हड़कंप मच गया और उनमें से कई छात्रों में अपनी पढ़ाई पूरी किये बिना ही यूनिवर्सिटी से बाहर जाने का डर साफ नज़र आने लगा….. और फिर क्या था छात्र भी एकजुट होकर शिक्षा के अपने अधिकार के लिए दिल्ली की सड़कों पर उतर आये I लड़के, लड़कियां और फिजिकली डिसेबल्ड सेक्शंस से आने वाले सभी छात्र एकताबद्ध होकर संसद की तरफ निकल दिए लेकिन वहां उनके स्वागत के लिए पुलिस के डंडे, बेरीकेड, वॉटर कैनन, टीयर गैस अम्मूनिशन, अर्धसैनिक बलों की टुकड़ियां और खाली बसें पहले से मौजूद थीं I उसके बाद छात्रों के आंदोलन को कुचलने के लिए जिस तरह से निरंकुश सत्ता के हथियार एक साथ छात्रों पर टूटे तो कुछ समय के दिल्ली की सड़कें ही कश्मीर हो गयीं I ये सभी ने देखा और ये भी देखा कि कैसे सरकार और एक पार्टी का प्रोपेगंडा मशीनरी बन चुका मीडिया का एक धड़ा पूरे मूवमेंट को ब्लैक पैंट करने पर लग गया I
लेकिन, जो कुछ हुआ उसका विश्लेषण और व्याख्या करना इस आर्टिकल का उद्देश्य नही है बल्कि इसका उद्देश्य दूसरा है… इसका उद्देश्य है कि आखिर JNU और देश के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों को लगातार क्यों टारगेट किया जा रहा है I आखिर सत्ता में बैठे हुए कुछ लोग क्यों जानबूझ कर पूरे यूनिवर्सिटी सिस्टम को ही ध्वस्त करना चाहते हैं? आखिर ऐसा करने में किसका हित जुड़ा हुआ है? आखिर एक विचारधारा विशेष से जुड़े हुए लोगों को पढ़ते -लिखते हुए लोग क्यों अच्छे नहीं लगते? क्या वर्तमान सामाजिक -आर्थिक स्थितियां -परिस्थितियां भी इसका कारण हैं? ऐसे ही कई सारे सवालों को ऑब्जेक्टिव ढंग से इस आर्टिकल में समझने की एक छोटी सी कोशिश की गयी है I
ये तो आम बात है कि सत्ता द्वारा लिए गए फैसले और सत्ता संरचना में जो कुछ भी घटित होता है वो अनायास नहीं होता… बल्कि इन सब के पीछे सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक और अन्य बहुत सारे तरह के ठोस भौतिक कारण होते हैं I इन कारणों को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है —

(1) MACRO REASONS
(2)MICRO REASONS

MACRO REASONS
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(1) Divert And Rule Policy

वैसे तो हर सत्ता इस पॉलिसी का इस्तेमाल करती है लेकिन इस सरकार की तो ये मुख्य रणनीति रही है I जनता को जितने सब्ज बाग और सुहाने सपने दिखाए गए थे वो सारे के सारे धूमिल हो गए I सरकार आर्थिक मोर्चे पर बुरी तरह विफल है… Hunger Index की वैश्विक रिपोर्ट में भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी गयागुजरा है, भयंकर बेरोजगारी है और सरकार रोजगार के सवाल पर ही नहीं आना चाहती I पिछले कुछ सालों में मोदी सरकार द्वारा लिए गए नोटबंदी और GST जैसे फैसलों की बजह से आज देश में भयंकर आर्थिक मंदी है…. तो ऐसे में सरकार को अपना चेहरा बचाने के लिए लगातार लोगों की भावनाओं से खेलने वाले मुद्दों का सहारा लेना पड़ता है फिर चाहे वो मंदिर -मस्जिद हो, पाकिस्तान -कश्मीर हो या फिर नकली राष्ट्रवाद का मुखौटा I ऐसे में JNU को अटैक करना भी असल मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाना ही है क्योंकि सनद रहे कि पिछले दो -तीन सालों से JNU को भी एक ‘भावना’ का रूप दे दिया है I

(2) Critical Health Of Economy

देश में भयंकर Economic Slowdown है. सारे सेक्टर मंदी की भयंकर चपेट में हैं I लोगों की क्रयशक्ति (Purchasing Power ) सरकार की विफल आर्थिक नीतीयों की बजह से नष्ट हो चुकी है I इस को समझने के लिए हमें सरकार के पिछले कुछ फैसलों और कानून को गौर से देख लेना चाहिए… कोई भी सरकार तभी किराया, फीस, दवा, जुर्माना, टोल टैक्स और बिजली -पानी का बिल महंगा करती है जब अर्थव्यवस्था की हालत बेहद खराब हो I इसलिए, वर्तमान सरकार चाहे कुछ भी कहे लेकिन आज देश की अर्थव्यवस्था वेंटीलेटर पर है I

लेकिन, ये सब तो उथले कारण हैं, असल कारण तो सूक्ष्म हैं.

MICRO REASONS
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(1) JNU Vs Gurukulisation Of University System

JNU हमारे देश के यूनिवर्सिटी सिस्टम के लिए मॉडल है क्योंकि इस विश्वविद्यालय की बुनियाद ही मुक्त लोकतान्त्रिक मूल्य और वैज्ञानिक चेतना (Scientific Temper ) पर रखी गई… आज के 21वीं सदी के आधुनिक युग में समय से मेल खाती शिक्षा हर किसी का एक अधिकार है लेकिन इसके ठीक उलट हमारे देश में एक ऐसी भी विचारधारा है जिसे Modern University System ही स्वीकार नहीं है और बिडंबना है कि वही रिग्रेसिव विचारधारा आज हमारे देश की सत्ता के सदर मुकाम पर काबिज है I दरअसल, आरएसएस का अपने जन्म से ही ये मत रहा है कि Modern University System की जगह अवैज्ञानिकता से ओतप्रोत गुरुकुल मॉडल लाया जाए…. कथित शिक्षा की एक ऐसी प्रणाली जिसमें शिक्षा कोई बुनियादी अधिकार न होकर एक दान (Charity) होती है और इस ‘दान’ को कुछ चंद लोग ही दे -ले सकते हैं मतलब Knowledge Creation की पूरी व्यवस्था को रूलिंग क्लास का एक खास तबका ही कंट्रोल करता है I ये एक बेहद Exclusive व्यवस्था है क्योंकि इसमें एक बहुत बड़े तबके को या तो शिक्षा की पूरी व्यवस्था से बाहर कर दिया जाता है या फिर एक खास वर्ग की Hegemony को बरकरार रखने के लिए रूलिंग क्लास द्वारा निर्मित घोर अवैज्ञानिक, अलोकतांत्रिक, महिला -विरोधी, पर्यावरण -विरोधी और सामंती मूल्यों वाली सूचना का बोझ ढोने के लिए विवश कर दिया जाता है I इसलिए, प्रगतिशील शिक्षा परोसने वाली JNU से आरएसएस की नफ़रत लाज़मी है I

(2)JNU Vs Corporatisation Of Education

ये एक मोटा तथ्य है कि मौजूदा सरकार कॉर्पोरेट की कठपुतली मात्र है और इसलिए हर सेक्टर का अबाध निजीकरण हो रहा है…. पब्लिक रिसोर्सेज को कौड़ियों के भाव कॉर्पोरेट की तरफ फेंका जा रहा है I और हो भी क्यों ना क्योंकि पूरी राजनैतिक व्यवस्था ही पर्दे के पीछे से कॉर्पोरेट पावर्स नियंत्रित करतीं हैं और Electoral Bond से तो ये दखल कई गुना बढ़ गया है…. पूंजी का नंगा नाच चल रहा है I नेता बनाने से लेकर उन्हें जिताने और खरीद -फ़रोख्त तक में बाजारू ताक़तों का जलवा देखा जा सकता है I चोम्स्की ने सही ही कहा है कि, “जो लोग तेल, शैम्पू और टूथ ब्रश बेचते हैं, वही लोग राजनैतिक दलों के चुनावी प्रचार संभालते हैं. ”
किसी भी देश की अर्थव्यस्था जब पूंजीवादी होने की प्रक्रिया में होती है, तो पूंजीवादी ताकतें दो सेक्टर्स पर सबसे ज्यादा फोकस करते हैं…. वो हैं स्वास्थ्य और शिक्षा क्योंकि मंदी का असर इन दो सेक्टर्स पर कम ही रहता है I किसान जहाँ दवा और शिक्षा के लिए अपनी जमीन बेच देता है वहीं मजदूर इन बुनियादी जरूरतो के लिए खुद को ही बेच देता है I
इसलिए, कॉर्पोरेट हितों के लिए ये सरकार पब्लिक एजुकेशन को पूरी तरह खत्म करना चाहती है और किफायती और अच्छी शिक्षा देने वाले JNU को खत्म कर JIO मॉडल को यहां के गरीबों पर थोपना चाहती है I JIO मॉडल के इन गुरुकुलों में लोगों को सूचना और शिक्षा को commodity की तरह बेचा जायेगा मतलब जेब में मोटा पैसा लाओ, और झोले में कोई भी डिग्री ले जाओ I इस व्यवस्था की शिक्षा के कंटेंट का सही विश्लेषण करने पर हम पाते हैं कि कॉर्पोरेट शिक्षा सिर्फ छात्रों को कुछ लोगों की सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक आधिपत्य को बरकरार बनाये रखना ही सिखायेगी….. वो शिक्षा JNU की तरह सत्ता से सवाल करने वाले नौजवानों का निर्माण नहीं करेगी बल्कि मोटे पैकेज का ख्वाब देखने वाले स्वार्थी नौजवानों का निर्माण करेगी I Pay Back to Society सिर्फ एक मजाक बन जायेगा I आश्चर्य ना होना चाहिए कि JIO मॉडल के गुरुकुलों में ऐसे कोर्स भी संचालित किये जाने लगे कि
सिर्फ एक महीने में सीखें कि ‘दो मिनट में उद्योगपति के जूते कैसे चमकायें. ‘

(3)JNU & Idea Of India Vs Narrow-mindedness Of RSS

JNU को करीब से देखने से पता चलता है कि ये यूनिवर्सिटी हमारे मूल Idea Of India को सही मायने में रिफ्लेक्ट करती है क्योंकि जिस तरह भारत हज़ारों विविधताओं से मिल कर बनता है, ठीक वैसे ही JNU भी सभी तरह की विविधताओं को अपने अंदर समेटे हुए है I इस विश्वविद्यालय में कश्मीर से लेकर सुदूर दखिण के कन्याकुमारी तक और छत्तीसगढ़ -झारखण्ड के जंगलों से लेकर अलग -थलग पड़े नार्थ -ईस्ट तक के छात्र पढ़ते हैं… इतनी ज्यादा भौगोलिक विविधता (Geographical Diversity ) देश के दूसरे किसी विश्वविद्यालय में शायद ही दिखे I चाहे वो भाषाई विविधता हो या सांस्कृतिक विविधता, सामाजिक विविधता हो या लैंगिक विविधता हर तरह की डाइवर्सिटी इस विश्वविद्यालय में मौजूद है….. ये वो यूनिवर्सिटी है जहाँ Sexual Binary के खांचे को तोड़कर LGBTQ Community के डिस्कोर्स को स्पेस दी जाती है. विचारधारा के दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस यूनिवर्सिटी को अक्सर लेफ्ट के गढ़ के रूप में प्रचारित किया जाता है जो कि अधूरा सच है क्योंकि यहां सारी विचारधाओं के लोग हैं…. Ideological Diversity विश्वविद्यालय में रची -बसी है I JNU बनता ही Micro Narratives से है ठीक वैसे ही जैसे इंडिया I और यही आज सबसे बड़ा गुनाह है क्योंकि सत्ता पर काबिज आरएसएस किसी भी विविधता को स्वीकार नहीं करता… वो सब कुछ अपने रंग में रंग देना चाहता है I एकरूपता उसका सपना है और नकली और संकीर्ण राष्ट्रवाद उसका हथियार I
आरएसएस Hindutva जैसी अवैज्ञानिक, अलोकतांत्रिक,संकीर्ण और विषैली विचारधारा को एक Meta Narrative बनाने पर तुला हुआ है I
तो अचरज नहीं कि आज JNU और Idea Of India दोनों पर संकट है I

(4) JNU & Intellect Building

किसी भी लोकतान्त्रिक और आधुनिक समाज के प्रत्येक विश्वविद्यालय का ये मुख्य कर्तव्य होता है कि वह अपने छात्रों में सवाल करने की प्रवृति मतलब Questioning Tendency का निर्माण करे ताकि वही छात्र अधिकारों के प्रति सजग रहने वाले सिटीजन बनें…… वो सारी अन्यायपूर्ण और कालवाह्य रूढ़ियों, प्रथाओं और व्यवस्थाओ से टकराने की क्षमता रखते हों I ऐसे छात्र जो संकीर्णता से ऊपर उठे हुए और वैश्विक दृष्टिकोण (World View ) रखने वाले हों… जिनके अंदर सपना हो समाज को आमूलचूल बदलने का और फिर से इसे नवीन विचारों और मूल्यों के आधार पर रचने का I और JNU बखूबी वर्षों से यही काम कर रहा है I
इसके ठीक विपरीत संघ छात्रों का निर्माण करना चाहता है.
दरअसल, कोई भी फासीवादी सोच जब किसी भी समाज पर एक Absolute Totalitarian Regime कायम करना चाहती तो उसके लिए सबसे बड़ी बाधा सोचने -समझने, लिखने -पढ़ने और सवाल करने वाले नागरिक होते हैं…. मतलब Questioning & Reasoning Tendency I
इसीलिए, फासीवादी विचारधारा हमेशा पूरी शिक्षा व्यवस्था को कैप्चर करती है ताकि ये शिक्षा के नाम पर लोगों के ब्रेन को कंट्रोल कर सके I आरएसएस का जोर शुरू से ही Questioning Tendency को मिटाने पर रहा है… ये छात्रों में Faith & Following Tendency को पैदा करना चाहता है और विद्या भारति के स्कूलों के माध्यम से कर भी रहा है ताकि नागरिकों को Following Subjects में बदला जा सके I

(5)Interrelation Of JNU & Marginalised Sections

मौजूदा संघी सरकार को सबसे ज्यादा चिढ़ दलितों, पिछड़ों, आदिवासीयों और अल्पसंख्यकयों की शिक्षा से है I सिर्फ Fee Hike ही नहीं 13 Points रोस्टर जैसी तमाम फैसले इस सरकार की बुरी मंशा की ओर इशारा कर रहे हैं I इस कमेरा वर्ग को शिक्षा से दूर रखने के लिए ही लुटेरा वर्ग की ये सरकार तरह -तरह के जाल बिछा रही है I

(6) JNU & State Vs Individual

JNU हमेशा से मानवाधिकारों के लिए मुखरता से बोलने और खड़े होने वाली यूनिवर्सिटी रही है. जब -जब सरकारों ने नागरिकों के अधिकारों को रोंदा है, तब -तब JNU सरकार के खिलाफ खड़ी नज़र आई I इसलिए ये कोई पहली सरकार नहीं है जिसके खिलाफ यूनिवर्सिटी खड़ी हुई है I वैसे भी लोकतंत्र में विश्वविद्यालयों को राज्य बनाम नागरिक की लड़ाई में नागरिक और उसके अधिकारों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए I
वहीं ये सरकार जो रातों -रात खुली जेल बना देती है…. जो लाखों को नागरिकता के अधिकार से वंचित करना चाहती है, उसे भला JNU कैसे रास आये I

अंत में यही कहा जा सकता है कि चाहे सरकार समझे ना समझे लेकिन आम लोगों को विश्वविद्यालयों के महत्व को समझना चाहिए I हमारे मिडिल क्लास में पूंजीवादी अमेरिका के प्रति एक आकर्षण है–तो उसे ये भी समझना चाहिए कि Second World War के बाद जब अमेरिका एक वैश्विक शक्ति बन कर उभरा तब सबसे ज्यादा जोर उसने अपने यूनिवर्सिटी सिस्टम को मजबूत करने पर दिया I

Arvind Yadav

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