वाह! सालों के पास गोलियां खत्म हो गयी हैं।’

‘हिटलर के यातना शिविर में यहूदी कैदियों को गोली मार देने का हुक्म आया।
अचानक, आखिरी समय में निर्देश हुआ कि गोली से नहीं, फांसी देकर उन्हें मारा जाएं।
एक कैदी ने हँसते हुए कहा – वाह! सालों के पास गोलियां खत्म हो गयी हैं।’


मेरी नज़र में यह कोई साधारण-सा चुटकुला नहीं है। इसका आखिरी वाक्य ईश्वर की किताब के उद्धरण जैसा है। मौत से ठीक पहले एक ऐसा परिहास जो उम्मीद की रोशनी कायम रखता है। सामने दिख रही मौत पर भी हँसा जा सकता है और हँसना एक तानाशाह को हमेशा असहज कर देता है।

दूसरे विश्वयुद्ध से जुड़ा इतिहास या साहित्य पढ़ने वक्त या उस दौर पर बनी फिल्में देखते वक्त मैं कई बार बेचैन हो जाता हूँ। इतने व्यापक नरसंहार और उससे भी बढ़कर उसके पीछे छिपा एक बहुत सोचा-समझा विचार मुझे हतप्रभ कर देता है। कई बार मन में निराशा सी उपजती है और लगता है कि मनुष्यता के भविष्य को लेकर बहुत आशावान नहीं हुआ जा सकता है। मगर एक छोटी सी चीज मुझे इस गहरी निराशा में उम्मीद की तरह नजर आती है और वह है इंसान की हर परिस्थितियों में हँसने की क्षमता।

नाजी जर्मनी में कई चुटकुले प्रचलित थे, जिनको ‘व्हिस्पर जोक्स’ कहा जाता था। यह बात रोमांचित कर देती है कि घेट्टो और कन्सनट्रेशन कैंप में मौत का इंतजार करते लोगों का सेंस ऑफ ह्यूमर खत्म नहीं हुआ था। होलोकास्ट की पुरानी तस्वीरों में कंटीले तारों के पीछे मुस्कुराते हुए बच्चे दिखते हैं। क्या पता इसके तुरंत बाद उन्हें गैस चेंबर में ले जाया गया हो। मज़ाक उनके लिए एक सरवावइल मैकेनिज़्म था कि वे कहीं मौत आने से पहले न मर जाएं। अगर हमारे भीतर हँसने की ताकत है तो हम ज़िंदा हैं। इस किस्म के कुछ ‘व्हिस्पर जोक्स’ को आगे देखा जा सकता है।

‘एक बार हिटलर अपने सहयोगियों के साथ एक पागलखाने को देखने गया।
वहां पर सभी पागल ‘हेल हिटलर, हेल हिटलर’ का शोर करते हुए हिटलर का अभिवादन कर रहे थे। लेकिन उनमें से एक ने ऐसा नहीं किया।
हिटलर ने उससे पूछा, तुम क्यों सलाम नहीं कर रही?
उसने कहा, ‘सर, मैं यहां नर्स हूं, पागल नहीं हूं…’


‘हिटलर और गोअरिंग बर्लिन के एक ऊंचे टावर पर खड़े पूरे शहर को देख रहे थे।
हिटलर ने पूछा, ‘गोअरिंग, मैं इस शहर के तमाम नागरिकों को खुशी से भर देना चाहता हूं। बोलो क्या करूं?’
गोअरिंग ने कहा, ‘फ्युह्रर, अभी इस टावर से नीचे कूद जाओ…’


‘एक जहाज, जिस पर हिटलर, गोअरिंग और गोएबल्स बैठे हुए थे, अचानक भयंकर समूद्री तूफान में फंस गया।
जहाज के क्रू से लोगों ने कहा, ‘अब तो सब खत्म हो जाएगा।’
क्रू के सदस्यों ने कहा, ‘नहीं, जर्मनी बच जाएगा…’

सन् 1943 में टावर से कूद जाने वाला चुटकुला सुनाने पर एक महिला को मौत की सजा सुनाई गई थी। गिलेटन पर उसका सर धड़ से अलग कर दिया गया। सजा सुनाते वक्त नाजियों पर इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ा कि उस महिला का पति हिटलर की सेना एक वफादार सौनिक था जो युद्ध में मारा गया था।

जिन हालात में इन चुटकुलों को गढ़ा, सुना-सुनाया और उन पर हँसा जा रहा होगा, वह जीवन के प्रति आपका नजरिया बदल देते हैं। निराशा और हास्य, भय, आतंक और परिहास के इस मेल को आप महसूस कर पाते हैं तो शायद आप एक बेहतर मनुष्य हो रहे होते हैं।

जर्मन इतिहासकार और फिल्ममेकर रुडोल्फ हरजौग ने उस दौर में कहे गए चुटकुलों का अपनी किताब ‘Dead Funny: Telling Jokes in Hitler’s Germany’ में उस दौर में पॉपुलर इन चुटकुलों का ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है। हिटलर के लिए काम कर रहे जर्मन लोगों के बीच भी ऐसे कई चुटकुले प्रचलित थे।

हरजौग कहते हैं कि ये चुटकुले बताते हैं कि सभी जर्मन नाजी प्रोपोगैंडा मशीन से सम्मोहित नहीं थे। हास्य एक बहुत बड़े प्रतिरोध का काम करता है। हरजौग ने नाजी जर्मनी में ह्यूमर पर ‘Laughing With Hitler’ नाम से एक डाक्यूमेंट्री भी बनाई है। जिसे बीबीसी और जर्मनी के चैनल वन पर बड़ी संख्या में लोगों ने पसंद किया था।

कठिन समय में हँस पाना इंसान और इंसानियत दोनों को ज़िंदा रख पाता है।
~दिनेश श्रीनेत जी की पोस्ट भाई गिरीश मालवीय की वाल से~

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