दन्त कान्ति का बिजनेस सेट करना

तेनालीरामन की प्रसिद्ध कथा है, राजा कृष्णदेव राय एक चापलूस कवि की कविता से प्रसन्न होकर उसे महामन्त्री बना देता है। उसके बाद प्रशासन की वाट लग जाती है। भ्रष्टाचार, महंगाई, अपराध बढ़ जाते हैं, टमाटर और दाल के भाव आसमान पर पहुँच जाते हैं। विजय माल्या जैसे लोग राजकीय कोष को लूटने लगते हैं। जनता रोने पीटने लगती है।

तेनालीराम को खबर होती है। वो उपाय करके राजा को सन्देश देते हैं। एक अच्छे शिल्पी को बुलाते हैं जो लकड़ी के सुन्दरतम सिंहासन बनाता था, राजा उसके काम से प्रसन्न होता है। उसे पुरस्कार और सम्मान मिलता है।

तेनालीराम होशियारी से जुगाड़ करके उसी शिल्पी को शाही-रसोइया बना देते हैं। उस रात का भोजन वही बनाता है। राजा परिवार सहित खाने बैठता है। पहला निवाला मुंह में लेकर ही वो चीख पड़ता है कि ये भोजन किस मूर्ख ने बनाया है? तेनालीराम कहते हैं कि ये भोजन आपके द्वारा पुरस्कृत उसी महान प्रतिभाशाली शिल्पकार ने बनाया है।

राजा गुस्से से चिल्लाता है कि शिल्पकार का रसोई और भोजन से क्या संबन्ध? तब तेनालीराम कहते हैं कि वही संबन्ध है जो एक कवी का प्रशासन चलाने से है।

राजा को बात समझ में आ गयी। लेकिन भारतीय जनता इतनी भोली है कि वह लच्छेदार भाषण देनेवालों और जुमले फेंकने वालों को, अच्छे नाचने गाने वालों को या अच्छी कथा सुनाने वालों को या योग की कसरत करने वालों को राजपाठ सौंप देती है।

ये जनता नचनियों और मदारी बाबाओं और कथा बांचने वाले अनपढ़ गंवारों की अपील पर ठगों को वोट दे देती है। खिलाड़ियों और अभिनेताओं को सांसद मंत्री इत्यादि बना देती है जिनकी देश समाज की कोई समझ नहीं होती।

इसीलिये चुनावी मौसम में बॉलीवुड के सारे नर्तक गवैये और आइटम स्पेशलिस्ट लगभग सारी पार्टियों का प्रचार करते मिल जाएंगे। बाबाओं के पंडालो में नेता, बाहुबली और सब तरह के चोर उचक्के हाजिरी देने लगते हैं। बाबा लोग भी होशियार होते हैं।

क्रान्ति का नारा लगवाकर अपना दन्त कान्ति का बिजनेस सेट कर लेते हैं। फिर चुनाव के बाद नयी सरकारों से सारे हिसाब बराबर करके चुप बैठकर आत्मा परमात्मा, योग, विश्व कल्याण इत्यादि पर वापस लौट आते हैं।

भारतियों को तेनालिरामन की इस कहानी से कुछ सीखना चाहिए।

संजय श्रमण

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