भेड़िये से लड़ाई में कोई नैतिकता और कोई नियम नही मानते

जंगल मे शेर से और भेड़िये से लड़ने के तरीके हमेशा अलग होते हैं क्योंकि इनके हमले का तरीका भी अलग अलग होता है ।

मूर्ख ही भेड़ियों पर शेर से लड़ने की टेक्निक आजमाएगा । शेर शेर होता है, उसकी गर्जना,उसका चलना और आंख में आंख डालकर लड़ना अलग है, उससे केवल शेर की ही तरह लड़ा जा सकता है ।

अब आई भेड़िये की बात,तो यह कभी अकेला हमला नही करता,हमेशा दो ही होते हैं या दो से अधिक । एक समाने से आता है तो दूसरा उधर से जिधर आपका ध्यान न हो, यह वार भी धूर्तता,बेरहमी और भयँकर छल से घेरकर करते हैं । इनसे लड़ने का तरीका शेर वाला नही हो सकता,इनसे दिमाग़ से लड़ा जाता है और लगभग इनके ही तरीके से क्योंकि जिस युद्ध में नियम जैसी कोई चीज़ न हो तो हर तरीके से लड़कर जीतना ही लक्ष्य होना चाहिए ।

हम शेर की लड़ाई में न्यूनतम नैतिकता के पालन के समर्थक हैं मगर भेड़िये से लड़ाई में कोई नैतिकता और कोई नियम नही मानते । जब जीवन रहेगा तब नए नियम,नए विचार बना लेंगे,जब जीवन ही न रहे तो सब बेकार । शेर के पंजो से मरना भी बहादुरी है और भेड़िये के दांतों में खुद का खून लगवाना बदसूरत हार और बदनामी है ।

मेरा बस चले तो मैं भेड़ियों को भी पास बैठा लूँ मगर यह निश्चित है कि वह कभी भी भेड़ नही बन सकते और न ही शेर,हाँ इनकी खाल ओढ़कर शिकार झपट सकते हैं केवल,इसलिए यह गिरह बांध लो हर लड़ाई का तरीका हर जगह नही इस्तेमाल होता है । दुश्मन देखकर लड़ने के तरीके बदलना ही तो कुशलता है । भेड़िये को मारने का कोई नियम नही है, यही नियम है । बस यह कला युद्ध मैदान तक रहे,जीवन मे न उतरे तो आप श्रेष्ठ हैं अन्यथा एक और भेड़िया..

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