अपनी संतानों को इतना संवेदनशील बनाया जाये

अधिकांश मित्रों की बिल्कुल वाजिब सलाह है कि अपनी संतानों को इतना संवेदनशील बनाया जाये कि वे किसी के भी साथ अमानवीय सुलूक न करें। पर यह भी सोचना जरूरी है कि हमारी पूरी सामाजिक व्यवस्था जब असंवेदनशीलता का कारख़ाना बनी हुई है तो हम अपने घरों में वो कौन सा भावात्मक शुद्धियंत्र लगायेंगे जो उन्हें समाज के पूरे प्रदूषण से मुक्त कर सच्चे संवेदनशील इंसान में तब्दील कर देगा।
हर साल देश में लगभग 50 हजार श्रमिक काम की जगह – खेत, खान, सीवर, बॉयलर, भट्टी, रेल लाइन, हर जगह – जान गंवा देते हैं क्योंकि सुरक्षा के इंतजाम से मुनाफा घट जाता है, लाखों बीमार, विकलांग होते हैं।
इन श्रमिकों में जो दलित, आदिवासी, उत्तर-पूर्व के या कश्मीरी, अल्पसंख्यक हैं वो साथ में अनेक शारीरिक, शाब्दिक हिंसा/अपमान भी झेलते हैं।
जो स्त्रियाँ हैं वे तो तिहरी-चौहरी पीड़ा झेलती हैं – श्रमिक वाला शोषण, वंचित-दमित समुदायों वाला उत्पीड़न, कार्य स्थल पर यौन हिंसा, फिर घर में भी शारीरिक, यौन, भावनात्मक तमाम किस्म की हिंसा।
फिर संपत्तिशाली तबकों, अपराधी गिरोहों, पुलिस-सशस्त्र बलों द्वारा कितनी हत्याएं, बलात्कार, लिंचिंग, लूट-मारपीट, उत्पीड़न, अपमान – ऊपर वालों की ही तरह बढ़ते क्रम में रोज होती हैं। हम विभिन्न जरियों से इन घटनाओं को जानते हैं मगर ये हमें विचलित नहीं करतीं, बस सूचना बन कर रह जाती हैं।
अचानक एक दिन दिल्ली या हैदराबाद में अवर्णनीय जुल्म घटित होता है या लखनऊ में पुलिस निजी कंपनी की ऊँची नौकरी वाले एक प्रबंधक की हत्या कर देती है। हमारा रोम-रोम काँप जाता है। अरे, ये तो हमारे साथ भी मुमकिन है! भरोसा टूट जाता है कि पहरेदारों वाले गेट सज्जित ऊँची चारदीवारी से घिरे करोड़-दो करोड़ के सीसीटीवी-विडियो फोन वाले फ्लैट में रहने के इंतजाम का ‘टीका’ लगवा कर हमने इन ‘हैवानों वाली घटनाओं’ के इन्फेक्शन से पूरी हिफाजत खरीद ली है!
चिंता, वाजिब चिंता, से भरे हम आभासी से वास्तविक दुनिया तक की बातचीत को नैतिकता, संवेदनशीलता, नेकनीयत भरी सलाहों से पाट देते हैं। पर ये सब नपुंसक-बाँझ अनुर्वर सलाहें हैं, इनसे नतीजा कुछ निकलता नहीं। कोई बात नहीं, अगली बार हम सब इन सलाहों से भरी, और लंबी, और ज्यादा, पोस्ट लिखेंगे!
लेकिन हमें और हमारी संतानों को असंवेदनशील औज़ार बना देने वाला ये कारख़ाना कैसे स्थापित हुआ, कैसे चलता है, इसके प्रबंधक कौन हैं, लाभांश किसे मिलता है, इसे कैसे ढहा-जला दिया जाये, इन सब सवालों पर बात किये बगैर आगे बढ़ने की राह मिलने वाली नहीं।
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