सुराज का मतलब क्या होता है ?

जो काम कांग्रेस को करना था , देर से ही सही उसे परिस्थिति कर रही है । मसलन सुराज का मतलब क्या होता है ? यह मसला उस पीढ़ी का नही था जो गांधी जी के एक इशारे पर बगौर सवाल उठाए , रिश्तों के यकीन पर दौड़ते चले गए । इसका जिक्र एक अमरीकी पत्रकार अपने संस्मरण में बड़े सपाट अंदाज में करता है । गांधी जी मद्रास के किसी सुदूर कस्बे में भाषण कर रहे थे । बहुत भीड़ थी , गांधी जी हिंदी में बोल रहे थे , अधनंगे बदन में एक खड़ा एक किसान गांधी जी को बड़े उत्सुकता से देख रहा था और ताली बजा रहा था । पत्रकार ने अपने दुभाषिया के मार्फ़त उस किसान से पूछा था कि क्या वह गांधी जी की बात समझ रहा है जो ताली बजा रहा है ? किसान ने सरल ढंग से कहा – बापू जो बोल रहे हैं सही ही बोलेंगे । ईश्वर की आस्था तक गांधी का व्यक्तित्व पहुंच चुका था । गांधी ने अपने कार्यक्रमों की लंबी चौड़ी व्याख्या नही की है , कर के दिखाया है । अब वह अभाव इस पीढ़ी को खटक रहा है । लेकिन कुछ परिस्थितियां वक्त की गांठ खोल देती हैं ।
सुराज , स्वराज ?
अंग्रेजी हुकूमत से आजाद होना ही सुराज नही है , हाँ यह एक विस्तृत पड़ाव है जहां हम खुल कर सांस ले सकते है और सुराज की ओर बढ़ सकते हैं । कांग्रेस ने सुराज यात्रा इस पड़ाव तक पहुचा तो दी लेकिन सुराज की अगली पहल धीमी हो गई । इस दिशा भरम के लिए व्यक्तियों को कम परिस्थितियों को ज्यादा जिम्मेदार मानना पड़ेगा । विस्तार में फिर कभी ।
सुराज
लाकडाउन । आप बाजार नही जा सकते । घर के बाहर कदम नही रख सकते । वगैरह वगैरह । इस मुल्क में लाकडाउन्न तीन श्रेणी में खड़ा है । शहर , कमबख्त यातना घर से भी बदतर हाल में है । मुफ्त में मिलनेवाली रोशनी तक के लिए तरस रहे हैं । दूसरे – कंधे पर गृहस्थी लादे सड़क टटोल रहा बड़ा समाज जो अपने जांगर से जी रहा था आज चलते चलते मौत से खेल रहा है , तीसरा है गांव । यहां का लाकडाउन गांव की मर्जी पर है । खेत तक निकल लो । बाजार झांक लो । दूर से हो , बोल के बोल के हंसी मजाक कर लो लेकिन सब्जी , मसाला , डिब्बाबन्द नमकीन , चीनी , म्हकौवा साबुन , गोरही क्रीम , कहां मिली रे ? -अथी लो ! जब शहर बन्द त शहरी समान कहां से आई ? आपन हाथ , जगन्नाथ । झाबू दुबे हंसे , कटई कहीं के , खौरहवा कुकुर माफिक बाजार के दोना चाटय के आदत पड़ गयी बा , भोगा ।
– त का किहा जाय , उपाय त बाताव ?
कमबख्त ! अब उपाय खोज रहे हो ? यहां गांधी खड़े होते हैं सुराज का सबक लिए –
‘ शहर कुछ नही उगाता , वह गांव के उत्पाद को अपने सांचे में ढाल कर , फिर गांव को ही लूटता है । तुम जिस दुकान से समान लेते हो सब तुम्हारे जांगर से उपजा है ।
अपना समान खुद बनाओ , खुद उपयोग करो । यही है सुराज । सब्जी , गुड़ , कपास , कपड़ा , बेसन तेल , मसाला सब तुम्हारा उत्पाद है । खुदमुख्तारी ही सुराज है ।
( इस लाकडाउन मे हम उन मुट्ठी भर हुक्मरान और उंगलियों गिने जा सकते धनपशुओं का जिक्र नही कर रहे हैं क्यों ये तवारीख में कहीं भी नही दर्ज होंगे , और कहीं फुटनोट में चर्चा चल भी गयी तो ये खलनायक लिखे जाएंगे )
सब्जी का सुराजी यह खादिम है , खादिन के संघतिया हैं और परिवार है जिसके मेहनत से स्वास्थ्य और स्वाद की सब्जी तैयार है । सामने सब्जी का खेत है ।
ब कलम खुद
खादिम

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