पानीपत के बहाने पानीपत

पानीपत के बहाने पानीपत पानीपत..

यह किसी इल्लम फिल्लम की समीक्षा नहीं है वरन पानीपत के मैदान की उस खासियत को तलाशने की नाकाम कोशिश है जहाँ हिन्दुकुश के सीमान्त इलाके को सैंकड़ों मील पीछे छोड़ ठीक दिल्ली की नाक के नीचे एक बार नहीं दो बार नहीं, तीन तीन बार दुश्मन को ताल ठोंकने का मौका किस ख़ुशी में दिया गया क्योंकि जहाँ हार का मतलब था इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ना और उस हार का इतिहास में दर्ज हो शर्म से आँखें झुकाना..खैर..

भारत के इतिहास का आमूलचूल परिवर्तन कर देने वाले सवा दो सौ साल के अंतराल में लड़े गए पानीपत के तीनों युद्ध बताते हैं कि आरपार की लड़ाई में भारतीय राजाओं की मति किस तरह मारी जाती थी.. भारत की तरफ से भारी-भरकम सेनाओं के सहारे लड़े गये इन युद्धों में कई देशी राजा बरसों बाद एकसाथ हुए, लेकिन तीनों युद्धों में राष्ट्र का नामोनिशान नहीं था..इन तीनों पराजयों ने इस देश का भविष्य सीधे अंधकार में धकेल दिया…

पानीपत के प्रथम युद्ध में एक तरफ था जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर, जिसने समरकंद और मध्य एशियायी इलाकों में लड़े गये ज्यादातर युद्धों में मात खाने का रिकार्ड बनाया था..आखिरकार उसे कोई ठौर तलाशने के लिये ईरान के शाह से मिन्नत करनी पड़ी.. लेकिन उसकी पटरी वहां भी नहीं बैठी और उसे भाग कर काबुल आना पड़ा..काबुल भी उसके मुआफिक नहीं आया..लेकिन वहां से जाता तो कहां जाता!

तभी उसे भारत पर हमला करने के लिये कई देशी ताकतों ने आमंत्रित किया..उनमें पंजाब के सूबेदार दौलत खां लोदी और दिल्ली के प्रतिष्ठित सरदार हिन्दू बेग के अलावा मेवाड़ के राणा सांगा भी थे..ये सब किसी न किसी वजह से सुल्तान इब्राहीम लोदी से खार खाये बैठे थे..इनको उम्मीद थी कि बाबर की मदद से इब्राहीम लोदी को बेदख़ल कर सत्ता की बंदरबांट कर लेंगे..

शुरू के छिटपुट हमलों के बाद 1526 के अप्रैल माह में बाबर अपनी 12 हजार सेना के साथ पानीपत के मैदान में आ डटा लेकिन जब उसने लोदी की फौज का आकार देखा तो उसकी रुह फ़ना हो गयी.. उसको केवल उन तोपों का सहारा था, जो भारत में पहली बार गोले दगने जा रही थीं..कुछ ही घंटे चले इस युद्ध में लोदी की एक लाख सैनिकों की फौज बाबर की तोपों की मार से पूरी तरह बिखर गयी और सुल्तान के साथ मैदान से भागने लगी, जबकि बाबर जीत के प्रति अंत तक आश्वस्त नहीं था..इब्राहीम लोदी मारा गया और आगरा और दिल्ली पर कब्जा कर भारत में बाबर का रुक जाना राणा सांगा को रास नहीं आया..

राणा सांगा ने सभी राजपूत राजाओं को गोलबंद कर बाबर को सीकर के पास कन्हवा में ललकारा..पानीपत युद्ध के एक ही साल बाद बाबर के सामने फिर एक लाख घुड़सवारों और पांच सौ हाथियों की फौज थी.. इतना ही नहीं, सैंकड़ों साल बाद कई सारे राजपूत राजा एक झंडे तले उसका मुकबला करने के लिये जमा हुए थे..बाबर के लिये इस बार भी करो या मरो का मामला था..उसने फिर अपनी तोपों पर भरोसा किया..जबकि राणा सांगा ने एक साल पहले हुए इब्राहीम लोदी के हश्र से भी कोई सबक नहीं सीखा था..वही तलवार, वही भाले और वही हाथी..15 हज़ार सेना वाले बाबर की तोपों की मार ने एक लाख से ज्यादा के जमावड़े को जमीन सुंघा दी..

पानीपत के दूसरे युद्ध में खेत रहा राजा विक्रमादित्य उर्फ राव हेमू, जिसकी हार ने भारत में 25 साल में ही उखड़ चुके मुगल साम्राज्य को पूरी तरह स्थापित कर दिया..

सन् 1556 के अंतिम दिनों में हुए इस युद्ध से पहले तक मुगल सत्ता केवल आगरा और दिल्ली तक ही सीमित थी.. दो-तीन साल पहले ही देश के एक बड़े हिस्से पर पठान शेरशाह सूरी का शासन रहा था और उन दिनों मुगल राजवंश का दूसरा बादशाह हुमायूं भाग कर ईरान में पनाह लिये हुए था..वहां वह करीब 10 साल रहा..मुगलों के नसीब ने करवट ली, शेरशाह सूरी कालिंजर के युद्ध में खत्म हुआ और हुमायूं को फिर आगरा के सिंहासन पर बैठने का मौका मिला लेकिन उसका तुरंत ही इंतकाल हो गया..उसे कुछ करने का मौका ही नहीं मिला इसलिये देश का बड़ा हिस्सा अफगानियों के कब्जे में बना रहा..

शेरशाह सूरी के कमजोर वंशज आदिल खान का प्रधानमंत्री था राव हेमू..विदेशी मुगलों को देश से भगाने के लिये उसने जबरदस्त अभियान चलाया और अफगानों व कई सारे राजपूत राजाओं और उनकी फौज को अपने साथ कर लिया..पहले ही झटके में आगरा और दिल्ली दोनों के हाथ में आते ही वणिक राव हेमू ने विक्रमादित्य का जामा ओढ़ अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली..

इस दौरान हुमायूं का 12 साल का बेटा मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर अपने संरक्षक बैराम खां के साथ जलंधर में फंसा हुआ था..यह सुन कर कि राव हेमू के पास पचास हजार घुड़सवार, एक हजार हाथी, 51 तोपें और विशाल पैदल फौज है, घबराहट के मारे अकबर ने काबुल जाने का मन बना लिया, लेकिन बैराम खां अड़ गया और केवल बीस हजार घुड़सवारों के बल पर मुकाबला करने की ठान ली..

हेमू दिल्ली से चला और अकबर जलंधर से.. इस बीच हेमू की अपनी ही बेवकूफी से सभी तोपें दुश्मन के हाथ लग गयीं..लेकिन तब भी हेमू का पलड़ा भारी था..युद्ध शुरू होते ही देशी फौज अकबर की सेना पर पिल पड़ी और एक समय ऐसा आ गया जब हेमू की जीत पक्की हो चली थी, लेकिन तभी हाथी के हौदे पर बैठ युद्ध का संचालन कर रहे हेमू की आंख में तीर जा घुसा और वह हौदे पर गिर पड़ा, उठने की कोशिश की, लेकिन तब तक राजपूत सेना में भगदड़ मच चुकी थी..हेमू पकड़ कर बैराम खां के सामने ले जाया गया और उसने एक वार से हेमू की गर्दन उड़ा दी..

पानीपत का तीसरा युद्ध अफगानों और मराठाओं के बीच लड़ा गया..अफगान आक्रमणकारी अहमदशाह अब्दाली इस युद्ध से पहले भी मुगल सल्तनत की धज्जियां उड़ाते हुए दिल्ली को बुरी तरह लूट कर हजारों औरतों, बच्चों और पुरुषों को ऊंटों पर लाद कर काबुल के बाजारों में बेच चुका था..

उसने फिर भारत पर चढ़ाई की, पर इस बार उसका रास्ता रोके खड़े थे एक लाख मराठा सैनिक..फ्रांसीसी तोपों और बंदूकों से लैस.. निर्णायक फैसले के लिये फिर पानीपत को ही चुना गया..युद्धक्षेत्र में अब्दाली के पहुंचने से पहले ही वहां मराठा सेना खाई-खंदक खोदे तैयार बैठी थी..

दोनों सेनाएं बजाये लड़ने के एक-दूसरे की घेराबंदी कर बैठ गयीं और हल्की-फुल्की झड़प के अलावा दो महीने तक देखा-देखी चलती रही..सारी गड़बड़ी यहीं से शुरू हो गयी..अब्दाली ने स्थानीय कुमुक के लिये पीछे की खिड़की खुली रखी जबकि मराठाओं की रसद वगैरह की सप्लाई के सारे रास्ते बंद हो गये..14 जनवरी 1761 को युद्ध शुरू हुआ, लेकिन नतीजा वही निकला..अब्दाली के घुड़सवारों ने मराठाओं  को दौड़ा-दौड़ा कर मारा..

इस हार के साथ ही देश भर में करीब पचास साल से चला आ रहा मराठाओं का दबदबा पूरी तरह खत्म हो गया..यहां हार का कारण मराठा सिपहसालारों की आपसी रंजिश बनी..मराठा कमान के सेनापति सदाशिवराव भाऊ की अपने भतीजे विश्वास राव से नहीं बन रही थी, जो पेशवा बालाजी विश्वनाथ का बेटा था..सिंधिया से होलकर खार खाये बैठा था, तो गायकवाड़-भौंसले अपनी-अपनी चला रहे थे..सबसे बड़ी बात यह कि मराठाओं को उत्तर भारत के किसी राजा से कोई मदद नहीं मिली..उन्होंने सालोंसाल जिस तरह मुगल बादशाह और उत्तर भारत के राजाओं से रंगदारी वसूली, उस कारण क्या सिख, क्या जाट, क्या रोहिल्ले और क्या राजपूत-सभी उनसे खार खाये बैठे थे..जबकि अब्दाली को जाटों और रोहिल्ले पठानों से वक्त-वक्त पर मदद मिलती रही..

इधर, 1757 में पलासी की लड़ाई जीत कर अंग्रेजों के हौसले बुलंद थे ही, मराठाओं की इस हार ने उनका इरादा भारत को पूरी तरह हथियाने का बना दिया.. तीन साल बाद ही अंग्रेजों ने मुगल बादशाह शाह आलम द्वितीय, अवध के नवाब शुजाउद्दौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम की तिकड़ी को बक्सर युद्ध में हरा कर ऐसी संधि को मजबूर किया कि उसके हाथ भारत के एक बड़े हिस्से की दीवानी लग गयी..

बक्सर युद्ध जीतने के बाद अंग्रेजों ने भारत के एक से एक बलशालियों की मिट्टी पलीद करनी शुरू की.. पहले पेशवा को निशाना बनाया, फिर सिंधिया को, होल्कर को, और सबसे अंत में महाराजा रंजीत सिंह के मरने के बाद सिखों को..मुगल बादशाहत तो पहले से ही बेदम थी.. निजाम को शुरू में ही अंग्रेजों ने अपना पिट्ठू बना लिया था.. इस दौरान अंग्रेजों का इरादा मैसूर के हैदरअली और उसका बेटा टीपू सुल्तान ही भांप सके, लेकिन उन्हें अंग्रेजों के खिलाफ किसी भी युद्ध में किसी भी देशी ताकत का सहयोग नहीं मिला…
राजीव मित्तल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *