स्त्रियाँ ख़ुद कितनी महत्वपूर्ण हैं,

पुरुष क्या करते हैं, किस तरह पेश आते हैं, कितने हृदयहीन या संवेदनहीन हैं, कैसे प्रेम करते हैं या दिल तोड़ते हैं, कैसे एक से निकल कर दूसरे में आसानी से चले जाते हैं, कैसे उन्हें फ़र्क़ नही पड़ता या पड़ता है, इन तमाम बातों की दिक्कत एक ही है कि सारा फ़ोकस पुरुष पर ही है.

जिस दिन स्त्रियाँ ये समझ लेंगी कि वो ख़ुद कितनी महत्वपूर्ण हैं, कि उनके जीवन का उद्देश्य महज किसी पुरुष को रिझाना भर नही है, उनका जीवन भी इन सबसे ऊपर व बढ़कर है, तब वो rejections से बेहतर डील कर सकेंगी, आत्म सम्मान को समझ सकेंगी जो ईगो नही होता, बेहतर self esteem विकसित कर सकेंगी जो घमंड नही होता, और अंततः ख़ुद पर फ़ोकस करना सीख सकेंगी.

इन मामलों में उपदेश देना या कोई निश्चित सिद्धान्त लागू करना मुझे पसन्द नही, क्योकि ये यात्रा अंततः सबको ख़ुद तय करनी होती है, मगर किसी स्टेटस से ये बात निकल कर आई तो जो लगता है मुझे वो लिख दिया.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *