वे तो प्याज़-लहसुन खाते ही नहीं हैं

प्याज़ के बढ़ते दाम

नेताओं ने कहा कि वे तो प्याज़-लहसुन खाते ही नहीं हैं। उनका तात्पर्य साफ़ है, आप भी न खाएँ। अब आइए दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था के अनुसार इसकी विवेचना करें। सरकार और अवाम को दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था पसंद है। आधुनिक दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था का आधार उपभोग है। उपभोक्ता उपभोग करेगा तो उत्पादक पूँजी लगाकर उत्पादन करेगा। बिचौलिए उन उत्पादों को उपभोक्ताओं तक पहुँचाएँगे। अब अगर प्याज़ न खाया जाए तो किसान क्यों उगाए प्याज़! बिचौलिये क्या करेंगे फिर! उसी तरह आप कार न ख़रीदें तो कार फ़ैक्ट्री में क्यों बने, मतलब फ़ैक्ट्री बन्द कर दें। न रहेगी फ़ैक्ट्री तो आप को नौकरी क्यों मिले। नौकरी न मिले तो आप घर पर रह कर खाएँ क्या? आप न खाएँ तो फ़ैक्ट्री बन्द, नौकरी गई। मतलब ये ₹5 ट्रिलियन इकॉनॉमी गई तेल लेने। मैं तो आज सुबह ही लिखने वाला था कि पूरा देश प्याज़ खाना छोड़ दे, कार ख़रीदना छोड़ दे, बीमार पड़े तो अस्पताल जाना छोड़ दे। आप सोच लीजिए कि अगर उपभोग बन्द कर दिया जाए तो ये पूँजीपति हमारी तरह से गरीब हो सड़क पर आ जाएँगे। प्याज़ का दाम अगर दस रुपए भी हो जाए तो अभी-भी बड़ी आबादी है जो इस दर पर भी प्याज़ नहीं ख़रीद सकती। पिछले एक माह से मैं देख रहा हूँ बिग बाज़ार और ईज़ी-डे से भीड़ ग़ायब है।

तो साहब मत उपभोग करिए कोई प्रोडक्ट लेकिन जान लीजिए दक्षिणपंथी अर्थव्यवस्था में उसका मतलब है आप की पूरी बदहाली। ये जो बोल रहे हैं प्याज़ मत खाओ तो उनको समझ में नहीं आ रहा कि वो क्या बोल रहे हैं! किसान प्याज़ न बोए तो खेती की ज़मीन बिल्डरों को बेच दे। इसी प्रकार गेहूँ-चावल न खाएँ तो अंत में उपभोक्ता को बिल्डिंगें खाने को मिलेंगी। तब प्याज़-गेहूँ-चावल के दाम नहीं बढेंगे। पूरा दक्षिणपंथी अर्थशास्त्र चक्र नहीं दुश्चक्र है। फ़िलहाल मत खाएँ प्याज़!

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