ट्रंप-मोदी मित्रता कहाँ तक कामयाब हुयी है

ट्रंप-मोदी मित्रता का भरपूर बखान किया गया. मानो दोनों कुम्भ के मेले में भटके हुए लंगोटिया यार हो भारत के वैश्विक हितों को साधने में यह मित्रता कहाँ तक कामयाब हुयी है? ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिका की वो नीतियाँ जो भारत के हितों के प्रतिकूल रही है? इन्ही सब बिन्दुओ पर पड़ताल करने की छोटी सी कोशिश … (भूलचूक हो तो माफ़ करना,कमेन्ट कर बता देना, सुधार करूँगा )

डोनाल्ड ट्रंप को भारत के राष्ट्रवादियों द्वारा बड़े स्तर पर जनसमर्थन मिलता रहा है (जिसमें हम भी शामिल रहे है,लेकिन अब नहीं है) क्योंकि ट्रंप रेडिकल इस्लामिक टेरेरिज्म का मुद्दा ज़ोर शोर से उठाते थे. जिसे भारतीय पाकिस्तान से जोड़कर देखते थे. जम्मू-कश्मीर में भी आतंकवाद के मूल में यही “रेडिकल इस्लामिक टेरेरिज्म” था जिस पर ट्रंप से पहले इतने मुखर होकर कोई अमेरिकी राष्ट्रपति का प्रत्याशी नहीं बोलता था.
अमेरिकी राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार ट्रंप मोदी जी के नारे “अच्छे दिन आने वाले है”या “अबकी बार ट्रंप सरकार” को भारत से उठाकर अमेरिका में कॉपीपेस्ट कर रहे थे ऐसा पहली बार था जब किसी भारतीय प्रधानमंत्री को अमेरिकी चुनाव में इतनी तवज्जों मिल रही थी. मोदी जी की भारतीय जनमानस पर अटूट पकड़ थी और अमेरिका में बड़ी संख्या में गुजराती अप्रवासी भी थे. भारत के प्रधानमंत्री का सम्मान मतलब भारत का सम्मान

अमेरिका के ह्यूस्टन में हुए हाउडी मोदी कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति ट्रंप को उनकी ” रेडिकल इस्लामिक टेरेरिज्म” वाली बात पर ख़ुद मोदी जी ने “स्टैंडिंग ओवेशन” दिया था. भक्तों का सीना फुलकर 56 इंच का हो गया. ग़लतफ़हमी का यह सिलसिला ज्यादा देर नहीं रहा. अगले ही दिन राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तानी PM इमरान खान के साथ हुई संयुक्त प्रेस कांफ्रेस के दौरान एक सवाल के जवाब में स्पष्टीकरण देते हुए कहा- रेडिकल इस्लामिक टेरेरिज्म से मेरा इशारा ईरान की ओर था. पाकिस्तान तो हमारा अच्छा मित्र है. भारत की कश्मीर नीति के विपरीत ट्रंप ने दावा कर दिया कि मोदी ने मुझसे कश्मीर में मध्यस्थता करवाने की बात कही थी. बाद में बयान से पलट गये लेकिन फ़िर भी जब कब मौके-बेमौके कश्मीर राग अलाप कर भारत को असहज करते रहते है. हालाँकि उनकी इस बात को कोई भी बहुत सीरियसली नहीं लेता है.

ट्रंप की “डि-ग्लोबलाइजेशन” की नीति का भारत की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा. क्योंकि भारत जब “ग्लोबलाइजेशन’ का लाभ उठाकर वैश्विक व्यापार में अपनी भागीदारी बढ़ाने की ओर बढ़ रहा था. सस्ते श्रम और बड़े बाज़ार के चलते मल्टीनेशनल कम्पनियों को आकर्षित कर रहा था.तभी अचानक ट्रेड वार यानि आर्थिक संरक्षणवाद ने भारत के मंसूबों को झटका दे दिया. पिछले 8 वर्ष से हमारा मर्चेंटाइल गुड्स का निर्यात लगभग 300 बिलियन डॉलर के आसपास सिमट कर रह गया है.

ट्रंप ने भारत से GSP (जर्नलाइज्ड सिस्टम ऑफ़ प्रिफरेंस ) का टैग भी वापस ले लिया जिसके अंतर्गत भारत को अमेरिका को निर्यात करने में छूट मिलती थी. इससे भारत को तकरीबन 419 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ.ट्रंप यदा कदा भारत को “टैक्स हैवन” कह कर भारत की आलोचना करते रहते है.

ट्रंप की राष्ट्रवादी नीतियाँ भारत के होनहार युवाओं के हितों के प्रतिकूल थी जो रोजगार और उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका जाने का ख्वाब देखते थे. अमेरिका स्थित भारतीय डायस्पोरा भी ट्रंप की नीतियों से असहज ही है.

ट्रंप के “अमेरिका फर्स्ट” को लेकर उत्साह ने भारत में अमेरिका से आने वाले निवेश में बढ़ोत्तरी के प्रयासों को असफ़ल किया और भारत के लिहाज से महत्वपूर्ण टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर भी सहमति बनती नज़र नहीं आई. भारतीय विशेषज्ञों के मन में हमेशा ही यह टीस बनी रही कि अमेरिका भारत से ‘आर्म्स डील” तो करता है बाकी भारत के हितों वाले समझौतों पर आगे नहीं बढ़ता.

अमेरिका की मल्टीनेशनल कम्पनियों द्वारा भारत में “डेटा के स्थायीकरण” को लेकर भारत की मांग पर सहमति नहीं बन पाई. भारत फ़्रांस के “GAFA” की तरह का अमेरिका की गूगल, फेसबुक,अमेजन और एप्पल जैसी कम्पनियों के उस लाभ पर टैक्स वसूल नहीं कर पाया जो वो भारत से ऑनलाइन व्यापार में कमाती है.

WTO के मंच पर भारत अमेरिका परस्पर एक दूसरे के विपरीत खड़े नज़र आये. यही नहीं ट्रंप ने IPR पालिसी को लेकर भारत के खिलाफ सख्त रुख निरंतर अपनाए रखा

ट्रंप ने पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकल कर जलवायु परिवर्तन पर बनी वैश्विक सहमति को तोड़ने का काम किया है जिसका सर्वाधिक ख़ामियाजा विकासशील और अल्पविकसित देश उठाएंगे. भारत को भी नुकसान होगा. क्योंकि अमेरिका द्वारा ख़ाली किये गये स्पेस को भरने के लिए चीन आगे आयेगा. चीन के नेतृत्व वाली किसी भी पहल में भारत असहज ही रहेगा.

ट्रंप ने पाकिस्तान के सहयोग से तालिबान के साथ “शान्ति समझौता” करने का प्रयास किया. जिसमें अफगानिस्तान की सरकार की न्यूनतम भागीदारी थी. फ़रवरी में भारत यात्रा के दौरान ट्रंप ने भारत को तालिबान शांति समझौते में शामिल होने के लिए राजी कर लिया. हालाँकि अमेरिका की तालिबान से यह डील भारतीय हितों के प्रतिकूल थी. भारत ने अफगानिस्तान में 3 बिलियन डॉलर का निवेश संसद, सड़के, कौशल विकास और ऊर्जा क्षेत्र में किया है (ट्रंप ने इसका भी मजाक उड़ाते हुए कहा था कि भारत ने अफगानिस्तान में पुस्तकालय बनाया है ) तालिबान शासन में भारत का यह निवेश अधर में पड़ जाएगा. अफगानिस्तान में भारत की सॉफ्ट पॉवर काफी मजबूत रही है. बात चाहे क्रिकेट की हो, भारतीय फ़िल्में या अफगानिस्तान के नेताओं का भारत के प्रति सहयोगपूर्ण नजरिये की हो. तालिबान से भारत को कश्मीर में रेडिकल इस्लामिक टेरेरिज्म के बढ़ने का ख़तरा है साथ ही अफगानिस्तान में पाकिस्तान का रोल बढ़ जाएगा. यह दोनों बातें भारतीय हितों के प्रतिकूल है.

ट्रंप ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबन्ध लगाकर भारत की ईरान नीति को अधर में डाल दिया. भारत ने सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ईरान के “चाबहार बन्दरगाह” का निर्माण किया जो चीन के नियंत्रण वाले पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से महज 70 किलोमीटर की दूरी पर है. साथ ही चाबहार बंदरगाह अफगानिस्तान से होकर “सेन्ट्रल एशिया” और रूस तक पहुँचने वाले “अंतरार्ष्ट्रीय उत्तर दक्षिण ट्रांजिट कोरिडोर” योजना के लिए महत्वपूर्ण था. ईरान भारत को रियायत पर क्रूड आयल की आपूर्ति करता था. ईरान से भारत तक यायायात व्यय भी कम था जो भारत के हित में था.मध्य एशिया की राजनीति में ईरान, साउदी अरब और इजरायल के साथ महत्वपूर्ण भूमिका में है. ईरान के चीन के साथ अच्छे रिश्ते अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद बने हुए है जो भारतीय नज़रिए से लाभकारी नहीं है. कल को चीन ईरान से चाबहार बन्दरगाह को लेकर दबाव बना सकता है. जो चीन की “रिंग ऑफ़ पर्ल्स” योजना का विस्तार हो सकता है.

ईरान से ऑइल सप्लाई ठप्प पड़ने के बाद भारत अमेरिका से ऑयल ले रहा है जिसका परिवहन खर्च काफ़ी अधिक है और वक़्त भी अधिक लगता है. भारत अमेरिका से ट्रेड सरप्लस में था. ट्रंप की नीतियों से यह ट्रेड सरप्लस निरंतर कम होता जा रहा है. यानि अमेरिका से भारत में आयात जिस रफ़्तार से बढ़ रहा है निर्यात उस रफ़्तार से नहीं बढ़ रहा है. आज भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है अमेरिका.

चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं को रोक पाने की क्षमता सिर्फ अमेरिका में है लेकिन ट्रंप के नेतृत्व वाला अमेरिका अपने क्षणिक लाभों के लिए, “जरूरत से अधिक आंतरिक नीतियों पर केन्द्रित””आवश्यकता से कम वैश्विक जिम्मेदारी निभाता नज़र आता है, जिससे आने वाले समय में “वैश्विक व्यवस्था”चीन के नेतृत्व वाली बनती नज़र आ रही है. कई महत्वपूर्ण वैश्विक संस्थाओं में जहाँ अमेरिका अपना सहयोग कम करता जा रहा है चीन तेजी से उस स्पेस को भरता जा रहा है. कोरोना वायरस को लेकर WHO का निराशाजनक रवैया बदलती “वैश्विक व्यवस्था” की ओर इशारा करता है.

ट्रंप ने बहुत ही चतुराई से भारत के साथ अपने संबंधो को संभाला और आगे बढाया है. इस मित्रता का भारत को कोई बड़ा वैश्विक लाभ नहीं मिला. न तो भारत को NSG की सदस्यता मिली और न ही वैश्विक व्यवस्था में कोई ऐसी महत्वपूर्ण भूमिका जो भारत की महत्वाकांक्षाओं को पूरा करती नज़र आती हो. उलटे भारत का नुकसान होता नज़र आ रहा है. मगर चीनी संकट के चलते भारत को अमेरिका से बेहतर रिश्ते बनाने ही होंगे, मगर रिश्ते सिर्फ व्यक्तिगत स्तर तक नहीं अपितु राष्ट्रीय अपेक्षाओं को पूरा करने वाले सिद्ध हो.

राष्ट्रपति ट्रंप और प्रधानमंत्री मोदी जी दोनों बखूबी समझते है कि “राजनायिकों की यह मित्रता सिर्फ प्रतीकात्मक स्तर की होती है असल उद्देश्य तो दोनों का अपने अपने राष्ट्रीय हितों को साधने का है. यह तो हमारी मिडिया खाली फ़ोकट मुद्दे को इतना तूल देती रहती है.
गौरव कटियार के इस लेख को प्रेषित किया है
 Geeta Kalkhura Pant  ने

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