चुनावी हवस से अर्थव्यवस्था ढह गई,

अर्थव्यवस्था क्यों ढह गई, इसका सिर्फ और सिर्फ एक कारण है चुनावलोलुपता. दूसरे शब्दों में इसे आप चुनावी हवस कह लें. तीसरे शब्दों में पूरे देश में एकछत्र राज करने का लालच या विस्तारवादी सोच कह लें. भारत समेत पूरी दुनिया में कोई नेता शायद ही होगा, जिसने पद पर रहते हुए इतनी रैलियां की हों, जितनी हमारे प्रधानमंत्री जी ने की हैं. वे प्रधानमंत्री बन गए हैं, फिर भी पार्टी नेता की हैसियत से रैली करते हैं. उनके हाथ में पूरे देश की कमान है, लेकिन वे छोटे से राज्य के चुनाव में भी कई कई रैलियां करते हैं.

मनुष्य की क्षमता और समय दोनों असीमित नहीं हैं. जब देश का मुखिया एक के बाद एक राज्य में ​सिर्फ चुनाव जीत लेने के लक्ष्य पर काम करेगा, प्राणपण से जुटकर रैलियां करेगा, तो देश कौन संभालेगा? यह देश नहीं महादेश है, इसकी व्यवस्था बहुत जटिल है. देश चलाना रैली में भाषण देने से अलग चीज है.

मजे की बात है कि ढहती अर्थव्यवस्था के दौर में भी प्रधानमंत्री बड़े मनोयोग रैलियां कर रहे हैं.

मनमोहन सिंह बोलते नहीं थे, उसका एक कारण यह भी था कि बोलने वाले हमेशा कम डिलीवर करते हैं. चाहे नई अर्थव्यवस्था लागू करना हो, चाहे उसे बूम कराना हो, चाहे अब उसे बदलने और सुधार के तरीके सुझाना हो.

मोदी जी ने अपनी कथित मेहनत से दो बातें साबित कीं. एक, मनमोहन सिंह बेहतर प्रधानमंत्री थे और दूसरी, बहुत बोलने का अर्थ यह नहीं होता कि काम भी करेंगे. दिन भर बोलते ही रहेंगे तो काम कब करेंगे?
Krishnkant

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *