गांधी और आंबेडकर

पिछले साल एक पत्रकार अमृता दत्ता से भेंटवार्ता में कन्नड लेखक व कार्यकर्ता देवनुर महादेवा ने कहा था, लोकतांत्रिक लोग आंबेडकर और गांधी को परस्पर प्रतिद्वंद्वी और विरोधी के रूप में न देखें। सच्ची समता की ओर यात्रा में दोनों नेताओं को परस्पर सहयोगी और सहकर्मी रूप में ही देखना चाहिए। महादेवा ने कहा, आंबेडकर को सोए हुए दलितों को जगाना था और तब आगे का सफर तय करना था। गांधी को एक कदम आगे बढ़ने के लिए उन लोगों को उबारने, सुधारने, बदलने के बड़े प्रयास करने थे, जो हिंदू जाति-धर्म में (जाति के कुओं में) डूबे हुए थे। जब आप ये सब देखते हैं, तो लगता है कि आंबेडकर की मौजूदगी के बिना गांधी शायद उतना नहीं चल पाते। इसी तरह, मैं महसूस करता हूं कि हिंदू जाति-धर्म के कुओं में गांधी द्वारा बनाए गए उदार सहिष्णु परिवेश के बिना निर्मम सवर्ण समाज आंबेडकर को शायद झेल नहीं पाता, जितना कि तब झेला था।’

महादेवा कहते हैं, ‘अगर हमारी समझ यह है कि जाति से भारत की मुक्ति के लिए सवर्णों को बदलने की जरूरत है, तो गांधी जरूरी हैं। दूसरी ओर, दलित नागरिक अधिकारों की लड़ाई में आंबेडकर बेशक जरूरी हैं। इसलिए मैं कहता हूं, दोनों को साथ लाना चाहिए।’

महादेवा बताते हैं, ‘छुआछूत को गांधी पाप कहते हैं और आंबेडकर अपराध’। हम इसे परस्पर विरोध के रूप में क्यों देख रहे हैं? आज इन दोनों को जरूरी समझना ही बुद्धिमानी है। दिल्ली में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन में आंबेडकर और गांधी के पोस्टर एक साथ देख मैंने देवनुर महादेवा की टिप्पणियों को याद किया। अगर यह अप्रत्याशित नहीं, तो विरल जरूर था। यह देखना बहुत आम है कि गांधी और आंबेडकर को अलग-अलग माना जाता है। सचमुच, कई दफा तो दोनों एक-दूजे के खिलाफ रख दिए जाते हैं। पहले आम तौर पर गांधी को चाहने वाले ही दोनों भारतीय नेताओं को परस्पर विरोधी रूप में देखते थे। आंबेडकर ने 1930 व 1940 के दशक में गांधी और उनके विचारों पर हमले के लिए विवादित शब्दों का अक्सर प्रयोग किया। इससे ऐसे कांग्रेसी भड़क जाते थे, जो अपने प्यारे बापू की रत्ती भर आलोचना भी बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। उन्होंने आंबेडकर को ब्रिटिश शासन का पक्षधर बताते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी। साथ ही, 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय वायसराय की कार्यकारी परिषद में बने रहने के लिए उनकी निंदा की। इधर हाल के दशकों में आंबेडकरवादियों ने भी ज्यादातर गांधी की आलोचना ही की है। वे गांधी की जाति-व्यवस्था सुधारने की कोशिश को बेमन या आधे-अधूरे मन की करार देते हैं। उन्होंने अपने नायक के बचाव में गांधी पर आरोप भी लगाए (पूना संधि के दौरान और बाद में) और गांधी के राजनीतिक उत्तराधिकारी जवाहरलाल नेहरू की आलोचना भी की। कहा गया कि दोनों आजाद भारत के पहले मंत्रिमंडल में सदस्य थे, लेकिन नेहरू ने उन वर्षों में आंबेडकर की प्रतिभा और क्षमता का भरपूर उपयोग नहीं किया।

उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में दलित बुद्धिजीवियों द्वारा गांधी पर किए गए हमले गंभीर और अविश्वसनीय थे। हालांकि कर्नाटक में वंचित लेखकों ने व्यापक दृष्टि रखी है। अपनी शानदार पुस्तक द फ्लेमिंग फीट  में स्वर्गीय डीआर नागराज ने हमें आंबेडकर और गांधी के काम को परस्पर पूरक के रूप में देखने का आग्रह किया है। जब जाति-व्यवस्था को कमजोर करने और छुआछूत घटाने के काम के लिए दोनों तरफ से दबाव डालने की जरूरत थी, तब दलितों की ओर से दबाव डालने का काम आंबेडकर ने किया और उच्च-जाति के सुधारकों का प्रतिनिधित्व गांधी कर रहे थे। नागराज और महादेवा दोस्त थे और यकीनन दोनों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया।

जामिया के छात्र और शाहीन बाग की औरतें भले इन दो लेखकों के काम को नहीं जानतीं, लेकिन वे नागराज और महादेवा की बात को ही साबित कर रही हैं। कर्नाटक के इन दो चिंतकों की तरह ही दिल्ली के साहसी प्रदर्शनकारी भी बहुत अनुराग के साथ गुहार लगा रहे हैं कि आंबेडकर और गांधी को परस्पर विरोधी रूप में मत रखिए, बल्कि वे जोर दे रहे हैं कि दोनों नेताओं को परस्पर सहयोगी रूप में ही देखिए। लोकतंत्र और बहुलतावाद की लड़ाई में दोनों नेताओं की विरासत को साथ लाने की जरूरत है।

दिल्ली के लेखक उमर अहमद ने शाहीन बाग के दौरे के बाद दिलचस्प ट्वीट किया कि प्रदर्शन में गांधी की तुलना में आंबेडकर के पोस्टर ज्यादा हैं। उन्होंने यह भी लिखा कि लोग आजादी के लिए एक नेता का शुक्रिया अदा करने से आगे बढ़कर एक ऐसे नेता का शुक्रिया अदा कर रहे हैं, जिसने उन्हें आजाद नागरिक के रूप में अपने हक हासिल करने के औजार दिए हैं। इसे पढ़ने के बाद मैंने रिट्वीट किया, ‘मैं सहमत हूं, लेकिन इस चेतावनी के साथ कि जब हिंदू-मुस्लिम सद्भाव के प्रचार की बात आती है, तब कोई भारतीय (नेहरू भी नहीं) गांधी के समकक्ष नहीं ठहरता।’…व्यापक रूप से आंबेडकर और गांधी को साथ देखना आश्चर्यजनक है, क्योंकि उन्हें परस्पर विरोध में रखा जाता है, जैसा कि हम देखने के आदी हो गए हैं। मेरी बात से अहमद भी सहमत थे, उन्होंने लिखा कि मैं भी यही दिखाना चाहता था कि दोनों नेता एक-दूसरे के पूरक थे। …तब के नेताओं में अपने अंतर्विरोध थे (और विफलताएं भी)। यह लोगों के लिए अच्छा है कि व्यक्तिगत रूप से उन्हें जो अपील करे, उसे ही वे चुनें।’

बेशक, न आंबेडकर गलतियों से परे थे, न गांधी।  दोनों ने गलतियां भी कीं, वैमनष्य और पूर्वाग्रह भी पाले। कोई भी उन्हें यंत्रवत लागू न करे, न आंखें मूंदकर उनके पीछे चल पड़े। वे जिस दुनिया में रहते थे, उससे बहुत अलग दुनिया में हम आज रहते हैं। 21वीं सदी के तीसरे दशक की राजनीतिक व तकनीकी चुनौतियां 20वीं सदी के मध्य के दशक की चुनौतियों से बहुत अलग हैं। वैसे नैतिक और सामाजिक चुनौतियां मोटे तौर पर समान हैं। जाति और लैंगिक समानता की लड़ाई भी खत्म नहीं हुई है। आस्थाओं के बीच सद्भाव के लिए हमारा जूझना अहम और जरूरी बना हुआ है, तो आज दुर्भावनापूर्ण ताकतों से मुकाबले के लिए आंबेडकर और गांधी को एक ही पाले में रखने की जरूरत है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)raamchanr guha

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