क्षत्रिय राजा द्विज को अपना पुरोहित बनाते थे मंत्री नहीं

हाथी हौदा पालकी जय कन्हैया लाल की..

यहाँ पर हाथी नाम के उस विशालकाय जीव का जिक्र
ज़रूर किया जाए, जो यजमान का इहलोक सुधारने
और परलोक को स्वर्गमय बनाने वालों की आध्यात्मिक इच्छा के चलते हिन्दुस्तानी राजाओं की सेना का लम्बे समय तक महत्वपूर्ण अंग रहा..

कलयुगी अर्थात राजपूत राजाओं के ब्राह्मण पुरोहित टाइप मंत्रियों ने उनके दिमाग में हमेशा यही भरा कि हाथी देवताओं के राजा इंद्र के वाहक ऐरावत का अवतार है,
और राजा का खुद का स्थान इंद्र जितना ही ऊंचा है..
घोड़ा तो मलेच्छों की सवारी है..इस कारण एक हज़ार साल पहले कई बाहरी आक्रमणों के सामने भारत को मुंह की इसलिये खानी पड़ी क्योंकि हाथी के हौदे पर
सोने के छत्र के साये में अपना झंडा फहराये बैठा राजा आसानी से दुश्मन का निशाना बन उसका तीर खा जाता, झंडा झुक जाता और राजा को ओंधा पड़ा देख
जीत देहरी पर खड़ी उसकी सेना में भगदड़ मच जाती और दुश्मन हारी हुई बाजी जीत जाता..

दुश्मन सेना की जीत में घोड़े की चपलता और पूरे युद्धक्षेत्र में उसकी मौजूदगी और हाथियों के अक्सर अपनी ही सेना को रौंदने की कई घटनाओं ने भी पांसा पलट दिया..जैसा कि झेलम के युद्ध में पोरस के साथ हुआ..

हज़ारों साल पहले कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत युद्ध में कौरव हो या पांडव, किसी पक्ष ने हाथी का सहारा नहीं लिया क्योंकि तब क्षत्रिय राजा द्विज को पूजा पाठ के लिए अपना पुरोहित बनाते थे मंत्री नहीं..

( आगे जल्द ही पानीपत )
राजीव मित्तल

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