क्योंकि उनके पास कोरोना संक्रमित नहीं होने का सर्टिफिकेट नहीं था

”इन्हीं सड़कों पे मर जाएगा इंसाँ हम न कहते थे’

इंदौर जैसे बड़े शहर में एक स्कूल के शिक्षक को सिर्फ इसलिए निजी अस्पताल में इलाज नहीं मिल सका, क्योंकि उनके पास कोरोना संक्रमित नहीं होने का सर्टिफिकेट नहीं था।…….. रिश्तेदार उन्हें एमवाय अस्पताल से निजी अस्पताल ले जाना चाहते थे। एम् वाय प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी हस्पताल है लेकिन कोरोना के कारण वहा के हालत बहुत खराब हो गयी है। ………….ग्रीन पार्क कॉलोनी निवासी मतीन सिद्दीकी (55) को परिजनों ने निमोनिया की शिकायत के बाद एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया था। दो दिन इलाज के बाद उन्हें एमवायएच भेज दिया गया। बेटे इरबाज ने बताया कि एमवायएच में पिता को भर्ती तो कर लिया, लेकिन इलाज के नाम पर कुछ नहीं हुआ परिजनों ने वापस निजी अस्पतालों से संपर्क किया तो उनसे कहा गया कि वे एमवायएच से यह लिखवाकर लाएं कि मरीज कोरोना संक्रमित नहीं है। पलासिया क्षेत्र स्थित एक निजी अस्पताल उन्हें भर्ती करने को तैयार हो गया, लेकिन वहां के डॉक्टरों ने कहा कि वे तब ही मरीज को भर्ती करेंगे जब एमवायएच से लिखकर दिया जाएगा कि मरीज को कोरोना संक्रमण नहीं है। इरबाज ने इस संबंध में एमवाय अस्पताल के डॉक्टरों से बात की तो उनका कहना था कि यह सही है कि कोरोना का संक्रमण नहीं है, लेकिन वे इस संबंध में लिखकर नहीं दे सके। सर्टिफिकेट नहीं होने से इरबाज पिता को निजी अस्पताल में शिफ्ट नहीं करवा सके। आखिर उन्होंने सोमवार शाम को दम तोड़ दिया। परिजनो का कहना है कि पर्याप्त इलाज मिल जाता तो जान बचाई जा सकती थी।…………………………….

जो लोग पोस्ट में हिन्दू मुसलमान ढूंढ रहे है वो एक बार सोच ले कि उनको भी कभी ऐसी ही परिस्थितियों से गुजरना पड़ सकता है

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